काव्या (Hindi Edition) por यश दत्त

काव्या (Hindi Edition) por यश दत्त
Titulo del libro : काव्या (Hindi Edition)
Fecha de lanzamiento : November 23, 2018
Autor : यश दत्त
Número de páginas : 20

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यश दत्त con काव्या (Hindi Edition)

#यश दत्त
#पुस्तक से ...
सुबह का अंतिम बैच जो करीब साढ़े नौ-दस के करीब का था, वह तीन लड़कियों का था । इन तीन लड़कियों में प्रिया हल्की मोटी और देखने में फेशनेबल थी, दूसरी गुरमीत लंबी और सुडौल शरीर की पंजाबन थी और तीसरी काव्या दुबली-पतली, बड़ी-बड़ी आँखों वाली, दुधिया गोरे रंग की,पतले होंठ वाली बेहद सुंदर लड़की थी । पिताजी के कॉलेज जाने के बाद कभी-कभी काफी देर तक ये लड़कियां बैठी रह जातीं । इनका सिलेक्शन टेस्ट हो गया था, कॉलेज बंद था, परीक्षा मार्च में थी । पिताजी के कॉलेज चले जाने के बाद भी इनका मेरे फ़्लैट में साधिकार बैठे रहना मुझे अखर जाता । मगर धीरे-धीरे इसकी आदत भी लग गई । तो ऐसे ही जिंदगी बढ़ रही थी ।
‘सर, आपने तो हमलोगों का सारा सिलेबस कम्पलीट करवा दिया है, अब बस नोट्‌स लिखना बाकी है । मतलब सर, आप अपनी सुविधा से हमलोगों के लिये नोट्‌स, सजेशन तैयार कर दीजिये और हमलोग ऐसे ही आकर लिख लेंगे । आप को रहने की जरूरत नहीं ! और कोई प्रॉब्लम होगी तो आप से पूछ लेंगे ।’ प्रिया ने एक दिन पिताजी के सामने यह प्रस्ताव रखा और पिताजी ने मान लिया । ये सब सप्ताह में तीन दिन ही आतीं, सो पिताजी इनलोगों के लिये बीच के दिनों में नोट्‌स तैयार करके रख देते । अब मेरा काम होता, जब ये सब आ जातीं, इनके सामने नोट्‌स रख देता और फिर अपनी पढ़ाई में आराम से लग जाता । मगर ये आराम ज्यादा दिनों तक नहीं रह सका । पिताजी नोट्‌स घसीटामार लिखावट में लिखा करते, सो बीच-बीच में इनलोगों को लिखावट समझने में काफी दिक्कत होती और चूँकि पिताजी मौजूद नहीं होते सो ये मुझसे ही पूछतीं कि कहाँ क्या लिखा हुआ है । पूछने का काम प्रिया या गुरमीत है करती, काव्या नहीं । वह अपना काम इनलोगों से ही करवाती । वैसे भी ये तीनों एक ही नोट्‌स लिखने आती थीं । अगर इनमें से कोई एक ही लिख ले तो भी बाकी का काम हो जाए मगर आतीं तीनों ही थीं ! प्रिया और गुरमीत दोनों मुझे भैया ही कहतीं, मगर काव्या मुझसे बात नहीं करती । उसे अगर कहीं नोट्स की लिखावट समझ में नहीं आती तो प्रिया या गुरमीत से इस तरह पूछ्वाती, ‘जरा उससे पूछ तो ये घुमाकर क्या लिखा हुआ है ‘ट’ या फिर ‘द’ ?’ तो मुझे अपनी पढ़ाई के अलावा पिताजी के इस बैच के लिए भी तैयार रहना पड़ता था । यहाँ सबसे अटपटी बात जो होती वह थी ये आपस में घुसुर-फुसुर कर के अचानक ठहाका लगा देतीं और मैं नर्वस हो जाता । खासकर काव्या के कुछ कहने पर भी गुरमीत और प्रिया रहस्यमयी तरीके से खिलखिला उठती ।
इसी तरह जनवरी जाकर फरवरी भी आ गया । वातावरण को वसंत के मौसम ने बेहद खुबसूरत बना दिया था । मुझे लगा कि मौसम का दिलों-दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इस समय घर में पढ़ते हुए भी मुझे बगल का गार्डेन खींचता रहता । वहाँ की खुबसूरत विशाल झील, झील के आस-पास के तरह-तरह के विशाल पेड़, सभी मुझे बुला रहे होते । झील के बीचों-बीच बने द्वीप पर के पेड़ देखकर मन कैसा तो हो जाता ! अक्सर मन में होता कि उस द्वीप पर जाकर बैठूं और वहाँ झाड़ियों में छिपे तोतों और बहुत सारी पंछियों का उड़ना देखता रहूँ । मगर पढ़ाई की घंटी फिर से दिमाग में बज उठती और गार्डेन से घर के लिए अनमने मन से चल पड़ता ।
पढ़ाई के प्रति ज्यादा लगाव ने मुझे पिताजी के छात्र-छात्राओं के बीच एक किताबी कीड़े की छवि बना दी थी । कहीं भी ज्यादा हँसना-बोलना मैं नहीं कर पाता था और अंदर के अपने कोमल मन को किसी के सामने खुलकर जाहिर नहीं कर पाता था । मेरी बातें दूसरों से बेहद औपचारिक होतीं और वह भी जरुरत भर ही ।
फिलहाल पिताजी के पास करीब सत्तर–अस्सी छात्र-छात्राएं पढ़ रहे थे । इसी तरह का आंकड़ा हर साल हुआ करता था । इसलिए पढुओं द्वारा हर साल यहाँ मेरे घर में सरस्वती पूजा का आयोजन भी किया जाता था । इस अवसर पर दो दिनों तक मेरे वन रूम फ्लैट में बड़ी भीड़ बनी रहती क्योंकि सारे के सारे लोग एक साथ, एक ही जगह पर मौजूद होते, वह भी अपने दोस्तों या छोटे-छोटे भाई-बहनों के साथ ।
तो इस बार भी मेरे घर में सरस्वती पूजा हो रही थी । कोई अपने दोस्त को ले आया था तो कोई अपनी गर्ल फ्रेंड को, तो कोई अपनी बड़ी बहन को तो कोई अपनी छोटी बहन को, कोई अपनी सहेली को तो कोई...! अवश्य ही पिताजी इन सब से अलग अपने कॉलेज की पूजा में लगे हुए थे । पिताजी हर साल पूजा के इस मौके पर अपने कॉलेज के पुरोहित बन जाते यानी वही वहाँ पूजा कराते । हालाँकि घर की पूजा के लिये हर साल पुरोहित खोजना कठिन हो जाता क्योंकि ऐसे मौकों पर ही पुरोहितों की माँग बढ़ जाती है । खैर इस बार भी बहुत खोजने के बाद एक छात्र ने एक कम उम्र पुरोहित का बंदोबस्त किया !